भगत ————-बाबा प्रणाम चुनाव चरम पर है।
बाबा ———-भगत प्रणाम अब माहौल रोमांचक होते जा रहा है महापौर से ज्यादा पार्षद ने कई वार्डों में रोमांचक मुकाबले हो रहे हैं।
भगत ————पहली बार बाबा राजनीति कई परिवार जिनको डॉक्टर ने कहा है वह चुनाव से बाहर है ।
बाबा ———-हां बेटा इस बार कई परिवार जो 2 दशक से अधिक समय से नगर निगम में चुनाव लड़े हैं कई चुनाव जीते के हारे हैं ।
सबसे पहले बात करें हम पूर्व महापौर सुभाष शर्मा की तो वह सबसे पहले पार्षद का निर्दलीय चुनाव लड़े दो पत्ती से पार्षद बने प्रतिपक्ष नेता बने दूसरी बार के पार्षद में सभापति तीसरी बार में भी सभापति और चौथी बार में महापौर बनने के बाद इस बार अपनी बहू रीता शर्मा को महापौर बनाना चाहते थे ।टिकट नहीं मिलने पर अपने पुत्र विमल शर्मा को पार्षद के टिकट के लिए भी प्रयास करा ,निर्दलीय फॉर्म भरा परंतु महाराज और राजे ने आम वापस करवा लिया।
दूसरा इसी वार्ड से गोस्वामी परिवार से इस बार कांग्रेस से अनिल गोस्वामी ने टिकट मांगा था। अंतिम समय में अलका शर्मा को मिल गया इसके पूर्व इसी वार्ड से इनके पिता कैलाश गोस्वामी भाजपा सेपार्षद रह चुके हैं दूसरे वार्ड से पार्षद रहने के साथ इनकी माताजी कमला कैलाश गोस्वामी जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी है इनके भाई जुगनू गोस्वामी भी पार्षद रह चुके हैं अभी भाजपा में प्रमुख पद पर है तो इनके परिवार से ही मामू गोस्वामी की पत्नी गुणवंती गोस्वामी भी पार्षद का टिकट लाकर चुनाव लड़ चुकी है। पूरे परिवार में कोई भी मैदान में नहीं है।
तीसरा परिवार है पूर्व महापौर शरद पाचुनकर वार्ड से पहले भाजपा से पार्षद प्रतिपक्ष नेता के बाद महापौर का चुनाव लड़े हार गए दूसरी बार निर्दलीय लड़े जीत गए ।तीसरी बार निर्दलीय लड़े हार गए इनके परिवार से इनके भतीजे धर्मेंद्र पाचुनकर को भी दो बार पार्षद का मौका मिल चुका है। इस बार इनके परिवार से कोई नहीं है लेकिन नए रिश्ते में कहे तो एक परिवार जरूर मुख्य पद के लिए लड़ रहा है।
चौथा परिवार के दिलीप बांगर का हे जो लगातार पार्षद रहे कभी वह स्वयं और कभी पत्नी आशा बांगर पार्षद रही है पार्षद का चुनाव वे केवल एक बार हारे उसके बाद कभी नहीं हारे इसके बाद परिवार तो नहीं कुछ और नेता राम प्रसाद सूर्यवंशी भी मैदान से बाहर है। देवलिया परिवार भी बाहर है पूर्व में स्वर्गीय कैलाश देवलिया पार्षद रह चुके हैं उसके बाद वे निर्दलीय महापौर का चुनाव लड़े हार गए उनके भतीजे पंकज देवलिया भी टिकट लाकर चुनाव हार चुके हैं इस बार सिंधिया खेमे से एक ही नाम था हरीश देवलिया का जो अंतिम समय में कट गया और यह परिवार भी चुनाव से बाहर हो गया। एक और परिवार है सौभाग सिंह गौड़ परिवार जिसमें सबसे पहले देवास से सूरज सिंह गौड पार्षद रह चुके हैं भगवान सिंह गौड़ हार गए उनके पिता श्री और उसके बाद कांग्रेस से उमेश गौड़ पार्षद का चुनाव जीते इस बार गौड़ परिवार नगर निगम की क्षेत्र से तो बाहर है परंतु गांव में जरूर चुनाव लड़ रहा है जनपद में सुरेंद्र गौड़ और पंचायत में उनकी पत्नी सरपंच का चुनाव लड़ रही है।
भगत ————–कई परिवार को भी लड़ रहे हैं मैदान में है।
बाबा————— हां बेटा जैसे भारतीय जनता पार्टी में दायमा परिवार संजय दायमा की पत्नी पिंकी दायमा वार्ड क्रमांक 5 से भारतीय जनता पार्टी की ओर से लड़ रही है तो दूसरा टिकट भी भारतीय जनता पार्टी ने दायमा परिवार को वार्ड क्रमांक 18 से रामेश्वर दायमा के पुत्र को दिया है रामेश्वर दायमा लगातार चुनाव हारने के बाद पहली बार उनकी पत्नी चुनाव जीती वार्ड क्रमांक 18 से वहीं से उनके पुत्र को मौका मिला है तो संजय दायमा पूर्व में वार्ड पांच में पार्षद रह चुके हैं इस कारण उनको भी पार्टी ने दूसरी बार मौका दिया है। कांग्रेस में ऐसे ही दो दशक से भी अधिक समय से हारून शेख का परिवार है जिसमें सबसे पहले शकीला हारून जो महापौर बनी फिर उनके पुत्र और बहू के बाद हारून शेख पार्षद का चुनाव लड़ चुके हैं हारून शेख प्रतिपक्ष नेता रहने के साथ विधानसभा का टिकट मिला चुके हैं इतने सबके बाद भी इस बार सभापति की दौड़ में शामिल होने के लिए उनके पुत्र और बहू को ना लगाते हुए स्वयं मैदान में है। दूसरा बेस परिवार धर्मेंद्र सिंह बेस इस बार चुनाव भारतीय जनता पार्टी से 40 नंबर से लड़ रहे हैं ।उसके पहले उनकी पत्नी पार्षद रह चुकी है एक बार चुनाव हार चुके हैं इनके भाई राजेंद्र बेस लगातार जनपद का चुनाव जीत रहे हैं। एक और कहार परिवार है जिनमें सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी की ओर से मदन कहार की पत्नी पार्षद उसके बाद अशोक कहार और फिर उनके भाई पार्षद रहे हैं इस बार निर्दलीय भाजपा से बगावत कर मैदान में है जबकि यह परिवार भाजपा के लिए पूर्ण समर्पित रहा है ।
भगत————- बाबा घरेलू महिला मामला भी जोर पकड़ रहा है कहीं पर विरोध हो रहा है तो कहीं पर समर्थन।
बाबा ——————–बेटा पहली बात तो पढ़ी लिखी महिलाएं राजनीति में कम आती है और आती भी है तो कुछ समय रह कर चली जाती है क्योंकि राजनीति में धैर्य तपस्या और निस्वार्थ काम करना होता है कई बार विपक्ष में लंबे समय तक धीरज रखकर समय का इंतजार करना पड़ता है वह वह कर नहीं सकती और जो जिन्होंने किया वे प्रदेश में और राष्ट्र में अपना नाम चमका रही है अब छोटी सी बात घरेलू महिला का विरोध करने वाले को यह समझ लेना चाहिए कि कहीं अपनी माता बहन दादी नानी बुआ कम पढ़ी होने के बाद भी पूरा परिवार चलाने के साथ देश में आजादी से लेकर आज तक उनका प्रमुख योगदान रहा है। आज कई परिवार का नाम चल आ गई शिक्षित मतलब केवल डिग्री लेने से ही नहीं हो जाता है उसके लिए कई बार जमीनी व्यक्ति गुणवान होने के साथ भी केवल डिग्री नहीं लेने के कारण शिक्षित की डिग्री से तो वंचित रह जाता है। लेकिन जमीन पर वह सफल कामयाब हो जाता है क्योंकि वह आमजन के बीच रहकर जीवन जीने की कला और जिंदगी को पाठ की तरह पड़ता है सफलता के लिए यह जिंदगी का जमीन का हकीकत पाठ मेहनत भी उतनी ही जरूरी है खैर बात घरेलू महिला को राजनीति में लाने की है महिला आरक्षण के बाद कई बार उनके पति अपनी पत्नी को ससुर बहू को भाई-बहन को या बेटा माता को चुनाव मैं खड़ा करता है तो जीत भी इन्हीं की होती है। आमजन सब समझता है हमारे दिन रात कौन काम आता है कौन अधिकारी से लड़कर विकास कार्य करवा सकता है हमारे संगठन के लिए वर्षों तक किसने कार्य किया विपक्ष में भी साथ खड़े रहने वाले अगर कभी अपनी पत्नी बहू बेटी माताजी को खड़ी कर देते हैं ।तो आमजन को उसमें उनका ही रूप दिखाई देता है, और फिर हम घरेलू महिलाओं को बढ़ाने की बात कहते हैं ।तो वह भी तो बाहर मैदान में आ जाती है और धीरे-धीरे राजनीति परिपक्वता भी उनमें आ जाती है कुछ जरूर है जो केवल मोहर बन कर रह जाती है लेकिन अधिकांश महिलाएं सफल रही है इंदौर में मालिनी गौड़ देवास में विधायक गायत्री राजे पवार और भोपाल में कृष्णा गौर घरेलू महिला से ही राजनीति में आई थी आज अपने दम पर खड़ी है ऐसी देश में कई घरेलू महिला के जो विपरीत परिस्थिति में घर छोड़कर राजनीति में आई आज सफल है । आम जनता को तो पार्षद के साथ पार्षद पति भी सेवा के लिए मुफ्त मिल रहा है और महापौर में महापौर के साथ महापौर पति भी मुफ्त ही तो मिल रहा है । पीपल तुलसी की पूजा और सारे संस्कार की रक्षा करने वाली घरेलू महिला यदि राजनीति में आ रही है भले ही उनके परिजन के सहारे तो आने दो यहां भी संस्कार संस्कृति और कुछ अच्छा ही होगा बजाय हाउ डू यू डू अंग्रेजी संस्कृति की डिग्री धारी की अपेक्षा। समय बदलेगा तब शिक्षित सीधे महिला भी राजनीति में आएगी तब तक तो विकल्प यदि घरेलू महिला है उनका आधार अच्छा है तो जनता स्वतंत्र है ।
भगत ———-कलेक्टर और एसपी के 2 वर्ष कब पूरे हो गए पता ही नहीं चला।
बाबा ——— जिले में कई अधिकारी आते हैं चले जाते हैं कुछ है जो अपने कार्य से अपनी पहचान आमजन में और एक इतिहास के रूप में लिख जाते हैं जब भी इतिहास पढ़ा जाएगा तो उनका नाम किसी पन्नों पर तो आएगा ।कोरोना आपदा में ही कलेक्टर और एसपी की आमद हुई और उस आपदा में कलेक्टर चंद्रमौली शुक्ला और पुलिस अधीक्षक डॉक्टर शिव दयाल ने अपनी पारी की शुरुआत आमजन से सीधा संपर्क बनाकर की कलेक्टर ने जहां विकास कार्य और कहीं विभागों में सुधार कर कुछ अलग करना चाहा तो पुलिस अधीक्षक ने भी दबंग ता के साथ कई फैसले लिए अपराधियों को सीधे सीधा करने की शैली और जनता से सीधा संपर्क कोरोना आपदा के बाद उपचुनाव और त्यौहार निपटाने के बाद अब पंचायत और निगम चुनाव सामने है दोनों का ही कार्यकाल सफल ही कहलाएगा अभी चुनाव मैं इतना ही चुनाव बाद उनके कार्यकाल के बारे में बात करेंगे ।
